‘रंका में डंका’ उपन्यास की कथा उस बगिया की तरह है जिसमें कई फूल खिले हैं। इन फूलों के रंग अलग-अलग होते हुए आकर्षक, मोहक और मन-प्राण को स्पंदित करने वाले हैं। कथा के केंद्र में हैं- स्थानीय टीनएजर्स लड़के-लड़कियों की प्रेम कहानियाँ, शिक्षकों की आपसी राजनीति, येन-केन-प्रकारेण प्रधानाध्यापक बनने की लालसा, विद्यार्थियों में नकल करने की बढ़ती प्रवृत्ति, शिक्षा अधिकारी कार्यालय का भ्रष्टाचार और पात्रों द्वारा गाली-गलौज की भाषा में बात करने की प्रवृत्ति। स्थानीय पढ़ा-लिखा समाज, शिक्षक समुदाय, ग्रामीण, पुलिस, यहाँ तक कि शिक्षा अधिकारी भी इस प्रवृत्ति से मुक्त नहीं हैं। उपन्यास में, शिक्षा-व्यवस्था की नस-नस में व्याप्त रिश्वतखोरी को परत-दर-परत उधेड़ा गया है। कई पात्र रिश्वतखोरी की इस व्यवस्था में अपने-आपको ढाल लेते हैं। कुछ नैतिकता-अनैतिकता के दोराहे पर खड़ा हो स्वयं को विवश पाते हैं। क्षेत्रीय बोली-बानी में रचे-पगे इस उपन्यास की भाषा की रवानगी देखते ही बनती है, जो आपको गुदगुदाती भी है, हँसाती भी है और कई जगहों पर चकित भी करती है। ऐसा प्रतीत होता है, मानो उपन्यासकार अपने पात्रों के बीच खड़ा हो, उनसे बातें कर रहा है तथा उन्हीं की भाषा, बोली और शब्दों में रोचक-रसभरी कहानी कह रहा है।