सत्ता और शक्ति के क्रूर पहियों के बीच कुचले गए मासूम सपनों की एक मर्मस्पर्शी दास्तान- ‘फुलाङ्गे’।
यह महज़ एक कहानी नहीं, बल्कि दार्जिलिंग की हसीन वादियों के पीछे छिपे ख़ून, पसीने और ऐतिहासिक संघर्ष का जीवंत दस्तावेज़ है। लेखक लेखनाथ क्षेत्री ने उस दौर को काग़ज़ पर उतारा है, जहाँ आम इंसान सत्ता के शतरंज की कठपुतली बनने को अभिशप्त था। लेकिन दार्जिलिंग को इस त्रासदी के दलदल में धकेला किसने? इसका उत्तर सरल दिखने वाले किरदारों के पीछे छिपे कई ख़तरनाक चेहरों के इर्द-गिर्द घूमता है।
यह आख्यान दार्जिलिंग के भूमिपुत्रों के उस ऐतिहासिक संघर्ष को बयाँ करता है, जिसने ‘गोरखालैंड’ आंदोलन की नींव रखी। पहचान की लड़ाई और राजनीति के दोहरेपन को उजागर करता यह उपन्यास सिर्फ़ एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि उस जन-आंदोलन का एक गहरा समाजशास्त्रीय अध्ययन भी है।
यदि आप दार्जिलिंग की चाय की ख़ुशबू के पीछे दबे कड़वे इतिहास, दर्द और विद्रोह की गूँज को महसूस करना चाहते हैं, तो ‘फुलाङ्गे’ आपके ज़हन पर एक अमिट छाप छोड़ जाएगी।