‘आकार’ किशोरावस्था की दहलीज़ पर खड़े एक ऐसे लड़के की कहानी है, जो मानसिक और शारीरिक बदलावों के बीच धीरे-धीरे अपने होने का अर्थ तलाश रहा है। गाँव की पृष्ठभूमि में रचा गया यह उपन्यास एक लड़के के बड़े होने की कथा के साथ-साथ रिश्तों, हिंसा, अपराध-बोध और करुणा की जटिल परतों में उतरता है।
लड़के का पिता बाहर से कठोर और क्रूर दिखाई देता है, लेकिन भीतर वह एक पुराने अपराध के बोझ तले दबा है। बचपन में ख़ुद को ‘मर्द’ और श्रेष्ठ साबित करने की चाह में उसने अपने सबसे क़रीबी मित्र को ऐसा मानसिक आघात दिया, जिसने उसकी दुनिया हमेशा के लिए बदल दी। अपनी इसी ग्लानि को दबाने के लिए वह क्रोध और कठोरता को अपना स्वभाव बना लेता है। विडंबना यह है कि उसी मानसिक रूप से विक्षिप्त व्यक्ति से लड़के की एक गहरी और अनकही दोस्ती हो जाती है।
‘आकार’ किशोर मन, पितृसत्ता, ग्रामीण जीवन और मनुष्य के भीतर छिपे अपराध-बोध की संवेदनशील पड़ताल करने वाला उपन्यास है। यह उन पाठकों के लिए है, जो गहरी, मनोवैज्ञानिक और मानवीय कथाओं में रुचि रखते हैं।